Friday, 17 March 2017

अक़्सर अल्फ़ाज मेरे

अक़्सर अल्फ़ाज मेरे, मेरा साथ  छोड जाते है
शाम, सनम आँखों की गुफ़्तगू में मिल जाते है

नतीज़ा  कूछ न निकला, नाकाम अख़बारों से
पढ़ते है पूरा, खबर कूछ मुँह जुबां कर आते है

मिलता क्या है, बयां यह लफ़्जों से होगा नही
गरीब के मुँह पर हसीं, दुआ हमको  दे पाते है

फिक्र नही होती, हश्र क्या होगा मुलाकात का
ख़यालों से ख़्वाबों तक महज़बी उतार लाते है

रात आधी, पूछे कोई जगाकर नींद से 'उदयन'
रूको सनम, बात आगे की लौटकर सजाते है

- उदयन

हकीमों से ना होगा इलाज मेरा

हकीमों से  ना होगा इलाज मेरा  हुनर ख़ूद का तु आज़माया कर
हो गुफ़्तगू नजरों से और मैं जी जाऊँ नकाब उतना सरकाया कर

फेर नज़रें अपनी रहनुमा  मेरे बिख़रे जिस्म के हर एक ज़ज्बें पर
मिलन होगा चाहे जब होगा मुझ दिवाने पर लह़ज़ा बिखराया कर

उभरते उरोज़ लचीले लब संगेमरमर सा तराशा हुआ ये तेरा हुस्न
आगोश़ की  आज़माईश, सुलगता  बदन, ख्वाबों में  सताया कर

होती हो रवानगी  होते होते भोर  बिचारे बेबस चाँद की 'उदयन'
बिखरे बिस्तर पे जूल्फ़ खोल महजबी उजालों में रूक जाया कर

- उदयन

ક્યારેક તીખી અનાયાસે

ક્યારેક તીખી અનાયાસે, તો કયારેક મીઠી હોય છે
સનમ, જિંદગી ના  રંગીન  સફર ની  લીપી હોય છે

મળવાને આતુર, હું દિવાનો એક મજાની મુલાકાતે
મજા સસ્તામાં, ક્યાં  પે'લાં ખુદા એ  દીધી હોય છે

એવું લાગે કે હમણાં પકડી લઉં મારા હાથમાં એને
લાગે જાણે, રસ્તામાં થોડી દીવાનગી પીધી હોય છે

સરકતો સમય કોઈનો થયો નથી ખબર છે 'ઉદયન'
બસ એ ક્ષણ મારી, જ્યાં તને સનમ કીધી હોય છે

- ઉદયન

है दर्द तेरी बर्दाश्त में

है दर्द तेरी बर्दाश्त में, ठिक, नहीं तो सुनाने आ भी जा
भरकर आँखों में वो ही लहजा फिर बुलाने आ भी जा

है जमाल चाँद सा मुख पर तो अदाएं भी पाल रखी है
बनकर आफ़ताब मुझे तेरी जरूरत जताने आ भी जा

है परवाह तुझे कमजर्फ जमाने की बेरुखी की हर दम
थोडी बहुत, गर हो मेरी तो  कभी दिखाने  आ भी जा

है बात क्या की पुकारता रहूँ हर पल सिर्फ मैं ही तुम्हें
जरा जरा  मोहब्बत हो  तुम्हें भी तो बताने आ भी जा

गुज़र रहा हूँ एक लंबी सफर की डगर पर से 'उदयन'
न आऊँगा कभी वापिस, सोचकर सताने आ भी जा

- उदयन

है सफ़र बहुत लंबा

है सफ़र बहुत लंबा और नज़रीया कि सनम बुलाएं
कभी हम सताएं कभी वो सताएं पर चाहत जताएं

है इश्तियाक़ हर मोड़ पे जिंदगी की तासीर बनी रहे
दोपहर से घनी शाम तक  जूल्फ़ें उसकी हम बनाएं

सज संवरकर आये लबों पर हलकी लाली लगाकर
मिटाएं जब भी वो, आँखों की चाहत में हमें छिपाएं

या अली,  तख़्त ओ ताज़ ओ हकूमत की  चाह नही
संगेमरमर सा  तराशा हुआ  हुस्न, संग शाम बिताएं

है बाकी क्या  अब तो  कह दिया जो इतना  'उदयन'
हो  क़ायनात में  जनम दूज़ा, यही  हमसफर कमाएं

- उदयन

इश्तियाक़ ~ चाह
तासीर ~ प्रभाव

गुज़र रही है तन्हा

गुज़र रही है तन्हा, जवां इंतजार में वो रातों की बात है
हो  न सकी  कभी मुकम्मल, वो मुलाकातों की बात है

इत्तिफ़ाक़न मिली थी निगाहें  जवानी की दहलीज़ पर
दरम्यािं कूछ न था फिर मचले वो ज़ज्बातों की बात है

इलाज न हुआ वो इश्क़  रहते  इबादत में तब्दिल हुआ
तस्बीह में दोहरायी रोज़  अनकही वो बातों की बात है

रहता तख़्त-ए-मोहब्बत पर यह फकिर 'उदयन' कभी
फांसला न कट सका वो दास्तां वो इमारतों की बात है

- उदयन

है पूराना फिर भी पसंदीदा

है पूराना फिर भी  पसंदीदा वो मेरा ख़ुमार मिल जाएं
है शाम तन्हाई का आलम फिर वो अब्सार मिल जाएं

मिलेगें ख़ूदा, हो जिसको  फुर्सत के लम्हों का वरदान
मिले तो  इस कदर मिले, ता उम्र  नौबहार  मिल जाएं

ताज़ ओ तख़्त ओ हकूमत  रहे  मुबारक  फिर  तुम्हें
हम  वतन परस्तो को  तो दार में  गुलजार मिल जाएं

हो असर 'उदयन'  मिलाजुला सोच से समझ तक का
मिला दे, खुद में ख़ुदा को  ऐसा  इश्तिहार मिल जाएं

- उदयन