Saturday, 22 April 2017

कुछ तजुर्बे जिंदगी के हमें मुँह जुबानी याद है

कुछ  तजुर्बे जिंदगी के  हमें  मुँह जुबानी याद है
थी कभी धूप खुशनुमा अब शाम भी बरबाद है

ना कारवां  ना मंज़िल  ना ही  पूरानी पहचान है
है चलती फिरती लाश कि आदमी भी नाबाद है

खुश्बू भीगे गेंसुओं की ज़हन में मेरे बस गयी है
है नही तु  पास हमारे, फिर भी  दिल आबाद है

वो  मसीहाई बांकपन था  याँ थी मेरी  मुहब्बत
लिखा जब तुझ पर मैनें  लफ़्ज़ लफ़्ज़ फवाद है

शोर बरपा  तितलीयों का  फिर  सुने आँगन में
सुने तो  मीठी धुन  और  समझे तो शिवनाद है

- उदयन

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